रोग रहित पहाड़ी आलू की नई किस्म, भंडारण क्षमता भी ज्यादा

रोग रहित पहाड़ी आलू की नई किस्म, भंडारण क्षमता भी ज्यादा

शिमला
आलू पर लगने वाले पिछेता झुलसा और निमोटोड सहित अन्य वायरसों से जो किसान परेशान रहते हैं, उनको अब घबराने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) के वैज्ञानिकों ने आलू की नई किस्म कुफरी करण विकसित की है। हिमाचल सहित देश के पहाड़ी और पठारों में इस किस्म की बेहतर पैदावार हो सकती है और इसकी भंडारण क्षमता भी ज्यादा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कई बीमारियों और वायरस से लड़ने की क्षमता आलू की इस नई किस्म कुफरी करण में मौजूद है।

आलू की फसल सबसे ज्यादा पिछेता झुलसा रोग से प्रभावित होती है। इसके अलावा आलू की फसल को जो छह वायरस तबाह करते हैं, उनसे भी यह किस्म लड़ सकती है। इस आलू का इस्तेमाल सब्जी बनाने में किया जा सकेगा। कुफरी करण के इस सफेद आलू के बीच के कंदों का भार 40 से 60 ग्राम तक होता है। देश के ऊंचाई वाले इलाकों में यह आलू अप्रैल-मई और मध्य पहाड़ों में जनवरी-फरवरी में उगाया जा सकता है। पठारों में इसकी पूरा साल फसल होगी। यह आलू 10 से 12 सेंटीमीटर गहराई में उगाना होगा। साढ़े तीन से चार टन प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत पड़ती है।
25.1 टन प्रति हेक्टेयर होगी पैदावार
इस किस्म से 25.1 टन प्रति हेक्टेयर आलू की पैदावार ले सकेंगे। इसमें 18.8 फीसदी शुष्क पदार्थ मौजूद हैं। फसल तैयार होते ही आलू निकालने में विलंब न करें। आलू के भंडारण से पहले आलू की खराब कंदों को नष्ट कर दें।

करीब 120 दिन में तैयार होती है फसल : भारद्वाज
सीपीआरआई के फसल सुधार विभाग के प्रमुख डॉ. विनय भारद्वाज कहते हैं कि कुफरी करण आलू बीमारी और निमोटोड जैसे वायरसों से लड़ने की क्षमता रखता है। भोज्य आलू की पैदावार भी अच्छी है और यह 100 से 120 दिन में तैयार हो जाता है।

 

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